देहरादून।* परम पूज्य आचार्य श्री 108 समय सागर जी महाराज के मंगल आशीर्वाद एवं गुरु माँ की परम अनुकम्पा से मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से तीन बहनों का देहरादून की पावन धरा पर आगमन हुआ। गांधी रोड स्थित जैन भवन में 105 माता श्री पूर्णमति जी के संघ में पलक दीदी, आकांक्षा दीदी एवं योगिता दीदी का भव्य मंगल प्रवेश हुआ।
इस शुभ अवसर पर आचार्य श्री 108 समय सागर जी महाराज ने तीनों बहनों को श्वेत वस्त्र धारण करने एवं केशलोच के लिए मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। तीनों बहनों के वस्त्र परिवर्तन के उपरांत उन्हें ब्रह्मचारिणी दीदी के पद से सुशोभित किया गया। यह अवसर जैन समाज के लिए हर्ष, गौरव एवं सौभाग्य का विषय रहा।
इस अवसर पर उपस्थित श्रद्धालुओं एवं समाज के लोगों ने तीनों बहनों का भावभीना स्वागत किया। इसके पश्चात भव्य गुरुभक्ति का आयोजन हुआ, जिसमें श्रद्धालुओं ने सहभागिता कर धर्मसभा की शोभा बढ़ाई।
## आत्मा को जानना ही जीवन का वास्तविक उद्देश्य: गुरुमाँ पूर्णमति माताजी
णमोकार मंत्र के शुद्ध उच्चारण के साथ धर्मसभा का शुभारंभ हुआ। इस अवसर पर गुरुमाँ पूर्णमति माताजी ने अपने प्रवचन में आत्मज्ञान, आत्मचिंतन, वैराग्य और आत्मकल्याण का महत्व समझाया।
गुरुमाँ ने कहा, “हे भव्य जीवों! आप सभी जानते हैं कि देखने के लिए आँखें खुली रखनी पड़ती हैं, सुनने के लिए कान खोलने पड़ते हैं, वस्तुएँ खरीदने के लिए जेब खुली रखनी पड़ती है और आनंद पाने के लिए ज्ञान का द्वार खोलना पड़ता है।”
उन्होंने कहा कि जीव ने अनंत काल चर्चा और बाहरी उपलब्धियों में व्यतीत कर दिया, लेकिन यह जानने का प्रयास नहीं किया कि वह वास्तव में कौन है। आत्मा और शरीर कभी एक नहीं हुए। जीव के चले जाने पर शरीर यहीं रह जाता है। इसके बावजूद मनुष्य प्रशंसा, प्रतिष्ठा, धन-संपत्ति, व्रत-तप और ज्ञान अर्जन में लगा रहता है, जबकि सबसे आवश्यक बात यह समझना है कि *मैं शरीर नहीं, ज्ञानस्वरूप आत्मा हूँ।*
गुरुमाँ ने कहा कि अनंत ज्ञानी और परमात्मा हुए हैं, लेकिन केवल उनके बारे में जान लेने से जीव सुखी नहीं हो सकता। जब तक वह बाहरी पदार्थों से दृष्टि हटाकर अपने निज ज्ञानस्वरूप आत्मा को नहीं पहचानता, तब तक वास्तविक सुख की अनुभूति संभव नहीं है। इस अवसर पर देहरादून सहित अन्य स्थानों से आए गणमान्य व्यक्तियों एवं जैन समाज के श्रद्धालुओं की उपस्थिति रही।