देहरादून: उत्तराखंड पूर्व सैनिक कल्याण सलाहकार परिषद के अध्यक्ष व भाजपा नेता कर्नल अजय कोठियाल (कीर्ति चक्र, शौर्य चक्र एवं विशिष्ट सेवा मेडल) ने कांग्रेस पार्टी के शीर्ष नेतृत्व पर करारा निशाना साधते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर उनकी नीतियों एवं निर्णयों पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
कर्नल अजय कोठियाल ने आज यहां भाजपा के महानगर कार्यालय में पत्रकारों के साथ बातचीत करते हुए कहा कि देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु से लेकर वर्तमान नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी तक कांग्रेस पार्टी के चेहरे बदले, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर उनकी सोच बिल्कुल भी नहीं बदली। उन्होंने पत्रकार वार्ता में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के हालिया बयानों पर सवाल उठाते हुए कहा कि देश की सुरक्षा कोई राजनीतिक प्रयोगशाला नहीं है, जहां गलत फैसलों की कीमत सैनिक अपने खून से चुकाएं और राजनीतिक नेतृत्व जवाबदेही से बच निकले। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस नेतृत्व का इतिहास राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े ऐसे फैसलों और घटनाओं से भरा है, जिनकी समीक्षा आज भी जरूरी है।
कर्नल कोठियाल ने सन 1962 में हुए भारत-चीन युद्ध को लेकर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की चीन नीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि 1954 के पंचशील समझौते और तिब्बत के संबंध में भारत के रुख ने देश की सामरिक स्थिति को प्रभावित किया। उन्होंने कहा कि तिब्बत भारत और चीन के बीच एक महत्वपूर्ण भौगोलिक सुरक्षा अवरोध था, जिसके कमजोर होने से भारत की उत्तरी सीमाओं पर रणनीतिक दबाव बढ़ा। उन्होंने कहा कि पंचशील के सिद्धांतों और हिंदी-चीनी भाई-आई के नारे के बावजूद वर्ष 1962 में चीन ने भारत पर हमला किया और तत्कालीन राजनीतिक नेतृत्व चीन की मंशा को समझने और सीमाओं की सुरक्षा के लिए पर्याप्त तैयारी करने में विफल रहा। कर्नल कोठियाल ने डॉ. भीमराव आंबेडकर और आचार्य जेबी कृपलानी द्वारा पंचशील तथा चौन नीति पर जताई गई आपतियों का उल्लेख करते हुए कहा कि देश की सुरक्षा के विषय में राजनीतिक नेतृत्व के फैसलों पर सवाल उठाना राष्ट्रहित के खिलाफ नहीं, बल्कि राष्ट्रहित की रक्षा के लिए आवश्यक है।कर्नल कोठियाल ने 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान तत्कालीन सैन्य नेतृत्व और जनरल बीएम कौल की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि सैन्य कमान और रणनीतिक निर्णयों में योग्यता तथा युद्ध संबंधी अनुभव की तुलना में राजनीतिक नजदीकी को प्राथमिकता दिए जाने के कारण देश को इसका नुकसान उठाना पड़ा। उन्होंने कहा कि युद्ध के दौरान सैनिकों को हथियार, अच्छा भोजन और कपड़ों सहित अन्य जरूरतों के लिए भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
उन्होंने कहा कि कहा कि हिमालयन ब्लंडर और 1962 के युद्ध से संबंधित सैन्य समीक्षा के दस्तावेज उस दौर के फैसलों पर चर्चा के लिए महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने विशेष रूप से 4 गढ़वाल राइफल्स और 13 कुमाऊं रेजिमेंट के सैनिकों के शौर्य का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय सैनिकों ने अदम्य साहस का परिचय दिया। रेजांग ला में मेजर शैतान सिंह और उनके साथियों की वीरता तथा जसवंत सिंह रावत के बलिदान को याद करते हुए उन्होंने कहा कि सैनिकों का शौर्य किसी राजनीतिक नेतृत्व की विफलताओं का पर्दा नहीं बनना चाहिए। कर्नल कोठियाल ने कहा कि सीमा पर लड़ने वाला सैनिक अपने प्राणों की बाजी लगाता है I इंदिरा गांधी के कार्यकाल की घटनाओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने मार्च 1966 में मिजोरम के आइजोल में भारतीय वायुसेना की कार्रवाई, नवंबर 1966 में गौ-रक्षा आंदोलन के दौरान संसद के निकट हुई पुलिस फायरिंग और 1975 में देश में लोकतंत्र को खत्म कर आपातकाल लगाए जाने के निर्णयों पर सवाल उठाए।उन्होंने आरोप लगाया कि इन घटनाओं में सत्ता के इस्तेमाल, नागरिकों के अधिकारों और सरकार की जवाबदेही से जुड़े गंभीर प्रश्न सामने आते हैं। कर्नल कोठियाल ने कहा कि आपातकाल भारतीय लोकतंत्र का वह काला अध्याय है, जो देश को याद दिलाता है कि सत्ता के केंद्रीकरण और असहमति को दबाने के क्या परिणाम हो सकते हैं। कोठियाल ने राहुल गांधी को भी राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े सवालों को लेकर घेरा। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर राहुल गांधी का आचरण नासमझी और अपरिपक्वता का मिश्रण है। इस अवसर पर हनी पाठक भी उपस्थित रहीं I