देहरादून। देवभूमि जल शक्ति कांट्रेक्टर वेलफेयर एसोसिएशन, देहरादून की ओर से जल जीवन मिशन कार्यालय इंदर रोड में धरना प्रदर्शन किया एवं ठेकेदारों ने जल जीवन मिशन कार्यालय में ताला जड़ दिया एवं अपनी बात रखी। इस धरणा का मुख्य उद्देश्य जल जीवन मिशन से जुड़े हुए ठेकेदारों के भुगतान में हो रही देरी एवं उनके ऊपर विभागों द्वारा अत्याचार, ग्राम प्रधानों द्वारा योजना को वेरिफाई कराने से संबंधित रहा। वहीं ठेकेदारों ने मिशन डायरेक्टर (आईएएस) विशाल मिश्रा को ज्ञापन दिया। इस धारणा में जेपी अग्रवाल, ध्रुव जोशी, यशपाल चौहान, सुनील गुप्ता, सचिन मित्तल, अंकित सालार, जगजीत सिंह एवं पीड़ित ठेकेदारों का समूह भी शामिल रहे।
उनका कहना था कि ठेकेदारों को समय-समय पर यह आश्वासन दिया गया कि जियो-टैगिंग पूर्ण होने के पश्चात भुगतान किया जाएगा। तत्पश्चात यह कहा गया कि के.एम.एल. फाइल तैयार होने पर धनराशि आवंटित होगी। अब यह सूचित किया जा रहा है कि अनक्यू आईडी बनने पर ही भुगतान संभव होगा। इस प्रकार ठेकेदारों को विगत दो वर्षों से भुगतान नहीं किया गया है, जिससे सरकार की मंशा स्पष्ट प्रतीत नहीं हो रही है। ऐसी परिस्थितियों में ठेकेदार गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं।योजनाओं की निर्धारित समय-सीमा समाप्त हो जाने के उपरांत भी ठेकेदारों को उनका रखरखाव एवं संचालन जारी रखने के लिए बाध्य किया जा रहा है। वर्तमान में योजनाओं की मॉनिटरिंग भी ठेकेदारों द्वारा ही करवाई जा रही है। जिन स्थानों पर अभी तक जलापूर्ति प्रारंभ नहीं हो पाई है, वहां स्थानीय जनता द्वारा कनेक्शन उखाड़ दिए गए हैं। इसके बावजूद ठेकेदारों से योजनाओं का संचालन जारी रखने की अपेक्षा की जा रही है।योजनाओं के निरंतर संचालन के बावजूद फाइनल बिल, एक्स्ट्रा आइटम, वेरिएशन आदि तैयार नहीं किए जा रहे हैं, जिसके कारण योजनाओं की एफसीआर स्वीकृत नहीं हो पा रही है। ठेकेदारों को भुगतान प्रक्रिया के स्थान पर किसी न किसी जांच, आईडी निर्माण अथवा फाइल तैयार करने जैसी प्रक्रियाओं में अनावश्यक रूप से उलझाकर रखा जा रहा है, जो कि उचित एवं न्यायसंगत नहीं है। अधिकारियों एवं शासन की कार्यप्रणाली के कारण ठेकेदारों को ऐसी स्थिति में डाल दिया गया है कि वे बैंक ब्याज के अत्यधिक भार के चलते दिवालियापन की कगार पर पहुँच चुके हैं। यह स्थिति अत्यंत गंभीर एवं चिंताजनक है। जहाँ एक ओर उत्तर प्रदेश में हाल ही में धन आवंटन किया गया है तथा केरल में 100 प्रतिशत भुगतान किसी वैकल्पिक योजना के माध्यम से किया जा चुका है, वहीं उत्तराखंड में इस प्रकार की व्यवस्था क्यों नहीं की जा सकतीकृयह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। यह भी उल्लेखनीय है कि उत्तराखंड में कई जाँच एजेंसियाँ अपने-अपने स्तर पर जाँच कर चुकी हैं। इसके बावजूद, प्रदेश में कार्य उच्च गुणवत्ता के साथ किए गए हैं। जो कार्य शेष हैं, वे ठेकेदारों की लापरवाही के कारण नहीं, बल्कि वन भूमि, राष्ट्रीय राजमार्ग एवं अन्य हाईवे संबंधी आपत्तियों के कारण बाधित हैं।