उत्तराखण्ड में 1200 लम्बित चुनावी याचिकाओं पर त्वरित कार्रवाई होः डॉ. शक्ति सिंह

देहरादून। समाजसेवी व पत्रकार डॉ. शक्ति सिंह बर्तवाल ने कहा है कि उत्तराखण्ड के पंचायती राज चुनावों में दोहरी मतदाता सूची के आधार पर हुए फर्जीवाड़े के विरुद्ध न्यायपालिका ने कड़ा रुख अपनाया है। डॉ. शक्ति सिंह आज यहां उत्तरांचल प्रेस क्लब में पत्रकारों से बातचीत कर रहे थे। उन्होंने कहा कि हाल ही में धारी (नैनीताल) की ग्राम पंचायत भदरेठ और चम्पावत की शक्तिपुरबुंगा जिला पंचायत सीट पर हुए ऐतिहासिक निर्णयों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कानून से ऊपर कोई नहीं है। उन्होंने मामले पर प्रकाश डालते हुए कहा कि नैनीताल (धारी) एसडीएम अंशुल भट्ट की कोर्ट ने भदरेठ की ग्राम प्रधान आशा मटियाली का निर्वाचन रद्द कर दिया है। उन्होंने बताया कि जांच में पाया गया कि उनका नाम दो जगह की मतदाता सूची में दर्ज था। कोर्ट ने दूसरे नंबर पर रहे प्रत्याशी निर्मल सिंह को प्रधान घोषित करने का आदेश दिया।
शक्ति सिंह ने कहा कि चम्पावत में जिला जज अनुज कुमार संगल की कोर्ट ने जिला पंचायत सदस्य कृष्णानंद जोशी का चुनाव शून्य घोषित कर दिया। जोशी का नाम पल्सों ग्राम पंचायत और चम्पावत पालिका के नागनाथ वार्ड, दोनों जगह दर्ज था प् लोकतंत्र की पवित्रता पर संकट और न्यायिक हस्तक्षेप उत्तराखण्ड पंचायती राज अधिनियम, 2016 स्पष्ट रूप से यह प्रावधान करता है कि कोई भी व्यक्ति एक से अधिक मतदाता सूची में दर्ज नहीं हो सकता। इसके बावजूद, राज्य निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली के कारण कई अपात्र लोगों ने चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। माननीय हाईकोर्ट के 11 जुलाई के ऐतिहासिक फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने भी अपनी मुहर लगा दी है। डॉ. शक्ति सिंह ने कहा कि सर्वाेच्च न्यायालय ने राज्य निर्वाचन आयोग के तर्कों को खारिज करते हुए कड़ी टिप्पणी कीरू ष्आप वैधानिक प्रावधानों के विपरीत निर्णय कैसे ले सकते हैं? यह टिप्पणी संवैधानिक संस्थाओं के लिए एक बड़ी चेतावनी है। न्याय में देरी पर चिंता वर्तमान में उत्तराखण्ड की विभिन्न जिला अदालतों में इस मामले से संबंधित लगभग 1200 चुनावी याचिकाएं लंबित पड़ी हैं। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेशों के बावजूद, इन मामलों में अपेक्षित गति नहीं दिख रही है। शक्ति सिंह ने कहा कि वे मामले को लेकर न्यायालय जा रहे हैं। उनका यह भी कहना है कि हम पुनः हाईकोर्ट की शरण में जा रहे हैं ताकि 11 जुलाई के आदेश को प्रभावी रूप से लागू कराया जा सके। राज्य निर्वाचन आयोग और इसके सचिव को कानून के दायरे में रहकर कार्य करना होगा। जब तक इन 1200 लंबित मामलों का त्वरित निस्तारण नहीं होता, तब तक लोकतंत्र की शुचिता अधर में रहेगी। उन्होंने कहा कि सत्य और पारदर्शिता की जीत यह लड़ाई किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि चुनाव प्रणाली की पारदर्शिता के लिए है। न्यायपालिका का यह रुख उन लोगों के लिए कड़ा संदेश है जो कानून की कमियों का फायदा उठाकर लोकतंत्र की नींव को कमजोर करते हैं।