देहरादून। हिमालय, जिसे सदियों से भारत की जलवायु व्यवस्था की रीढ़ माना जाता रहा है, आज एक गंभीर संकट के दौर से गुजर रहा है। केदार घाटी में बहने वाली मंदाकिनी सहित अनेक नदियों का उद्गम स्थल होने के साथ-साथ मानसून, जैव विविधता और करोड़ों लोगों की आजीविका का आधार रहा हिमालय अब जनवरी के तीसरे सप्ताह में बर्फ़ विहीन दिखाई दे रहा है। यह स्थिति किसी सामान्य मौसमी उतार-चढ़ाव का परिणाम नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन की प्रत्यक्ष और भयावह चेतावनी है।
सामान्यतः जनवरी का महीना हिमालयी क्षेत्रों में घनी बर्फबारी का होता है। यही बर्फ़ गर्मियों में पिघलकर नदियों को जीवन देती है। किंतु इस वर्ष पश्चिमी हिमालय से लेकर मध्य हिमालय तक बर्फबारी में भारी कमी दर्ज की गई है। कई ऊँचाई वाले इलाके, जो आमतौर पर सफेद चादर से ढके रहते थे, अब नंगे और सूखे नजर आ रहे हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार यह स्थिति ग्लोबल वार्मिंग और पश्चिमी विक्षोभों के बदलते स्वरूप का सीधा परिणाम है।
पिछले कुछ दशकों में हिमालयी क्षेत्र का औसत तापमान वैश्विक औसत से कहीं अधिक तेजी से बढ़ा है। तापमान में मामूली वृद्धि भी बर्फ़ के स्वरूप को बदल देती हैकृजहाँ पहले बर्फ गिरती थी, वहाँ अब बारिश हो रही है। इसका सीधा असर हिमनदों और ग्लेशियरों पर पड़ा है। कई छोटे हिमनद सिकुड़ चुके हैं और कुछ के अस्तित्व पर ही संकट मंडराने लगा है।
बर्फ़ विहीन हिमालय का प्रभाव केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है। मंदाकिनी और उसकी सहायक नदियों के जलस्तर में गिरावट देखी जा रही है। हिमालयी राज्यों के स्थानीय समुदाय इसके दुष्परिणाम पहले ही झेल रहे हैं। सेब और अन्य नकदी फसलों की पैदावार घट रही है, चरागाह सूख रहे हैं और पारंपरिक जीवनशैली पर संकट गहराता जा रहा है।
पर्यटन पर भी इसका गहरा असर पड़ा है। जहाँ कभी बर्फ देखने के लिए पर्यटकों की भीड़ उमड़ती थी, वहाँ अब निराशा हाथ लग रही है। देवरियाताल, तुंगनाथ घाटी और कार्तिक स्वामी जैसे प्रमुख पर्यटन स्थलों पर बर्फबारी न होने से पर्यटन व्यवसाय बुरी तरह प्रभावित हुआ है। केदार घाटी के निचले इलाकों में भी मौसम के अनुरूप बारिश न होने से काश्तकारों की फसलें चौपट हो गई हैं।
सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि यह बदलाव अब धीरे-धीरे नहीं, बल्कि बेहद तेजी से हो रहा है। वैज्ञानिक चेतावनी दे चुके हैं कि यदि मौजूदा प्रवृत्ति जारी रही, तो आने वाले दशकों में हिमालय के कई हिस्से स्थायी रूप से बर्फ़ विहीन हो सकते हैं।
इस स्थिति के लिए केवल प्राकृतिक कारणों को दोषी ठहराना पर्याप्त नहीं होगा। बढ़ता कार्बन उत्सर्जन, अंधाधुंध विकास, वनों का अत्यधिक दोहन, पहाड़ों में अवैज्ञानिक निर्माण और वाहनों की बढ़ती संख्या ने हिमालय को अत्यंत संवेदनशील बना दिया है। विकास के नाम पर हो रहे विस्फोट, सड़क चौड़ीकरण और सुरंग निर्माण प्राकृतिक संतुलन को और बिगाड़ रहे हैं।
प्रख्यात पर्यावरणविद् प्रोफेसर मोहन सिंह पंवार के अनुसार जलवायु परिवर्तन की समस्या दिन-प्रतिदिन गंभीर होती जा रही है और इसका सबसे बड़ा असर हिमालयी क्षेत्र पर पड़ रहा है। उनका कहना है कि औद्योगिक गतिविधियों से बढ़ता कार्बन उत्सर्जन, वनाग्नि की बढ़ती घटनाएँ और वायुमंडलीय गैसों का असंतुलन वाष्पीकरण की प्रक्रिया को प्रभावित कर रहा है, जिससे जलवायु परिवर्तन और तीव्र हो रहा है।
प्रोफेसर कविता भट्ट शैलपुत्री का कहना है कि मनुष्य प्रकृति का हिस्सा होते हुए भी स्वयं को उसका मालिक समझने लगा है। प्रकृति का अत्यधिक दोहन, बढ़ता प्रदूषण, बुग्यालों में पॉलीथीन का प्रयोग और वैश्विक स्तर पर युद्धों में बारूद का उपयोग जलवायु परिवर्तन के प्रमुख कारण बन रहे हैं। जनवरी में बर्फ़ विहीन हिमालय कोई साधारण समाचार नहीं, बल्कि आने वाले भविष्य की झलक है। यदि आज इस चेतावनी को नहीं समझा गया, तो आने वाली पीढ़ियाँ हिमालय को केवल तस्वीरों और किताबों में ही देख पाएँगी। अब समय आ गया है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित किया जाए, ताकि हिमालय और उससे जुड़ा जीवन सुरक्षित रह सके।