देहरादून। दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र की ओर से स्कूल ऑफ थिएटर एंड फिल्म के सहयोग से द प्रपोजल का नाट्य मंचन केन्द्र के सभागार में किया गया.एंटोन चेखव की कहानी पर आधारित हिंदी में तैयार यह हास्य नाटक 35 मिनट की अवधि का रहा. इस नाट्य प्रस्तुति को स्कूल ऑफ़ थिएटर एंड फिल्म ने भावपूर्ण तरीके से दर्शकों के मध्य रखा. इसकानिर्देशन कैलाश कंडवाल ने किया. इसमें भाग लेने वाले कलाकार थे -कैलाश कंडवाल, अभिषेक डोभाल, आरती शाही, प्रताप सिंह और निशांत राही. नाटक के मंच की सज्जा प्रताप सिंह की थी और वेशभूषा संयोजन आरती शाह की थीं। मुख्य बात यह है कि स्कूल ऑफ़ थिएटर एंड फिल्म्स विद्यार्थियों शिक्षकों की सामान्य संस्था है जो थिएटर और फिल्म को बढ़ावा देती है। इन्होंने इस वर्ष के साल की शुरुआत देहरादून के थिएटर को पुनर्जीवन देने की कोशिश से की है। जिसमें सबसे पहले दर्शकों को रंगमंच तक लाना , उनमें रंगमंच के प्रति आकर्षण बढ़ाना है। अपने इसी अभियान के तहत वेअपने इस प्रदर्शन को शहर के हर कोने में ले जा रहे है। इसी अभियान में संस्था रंगमंच प्रदर्शन स्थलों एवं रिहर्सल स्थलों की जानकारी जुटाएंगे और रंगमंच के लिए नए उभरते कलाकारों को जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं।
नाटक के निर्देशक कैलाश कंडवाल ने बताया कि देहरादून शहर की सभी संस्थाओं को वरिष्ठ रंगकर्मियों के सहयोग से एक मंच प्रधान करना भी हमारा एक उद्देश्य है ताकि शहर फिर से रंगमंच के उस माहौल से रूबरू हो सके जो काफी पहले था। पहले के मुकाबले परिस्थितियाँ काफी बदल चुकी है अब रंगमंच को वयवसाकिता की तरफ भी मुड़ना होगा ये सबके संयुक्त प्रयास से ही संभव हैं। दून पुस्तकालय के सभागार में मंचित चेखोव द्वारा लिखित और कैलाश कंडवाल द्वारा निर्देशित यह नाटक किसी एक दिन की घटना पर आधारित है जिसमें एक पडोसी अपने पड़ोस की एक लड़की को विवाह प्रस्ताव देना चाहता है लेकिन हर बार उन दोनों के बीच किसी न किसी बात पर झगड़ा हो जाता है कभी जमीन को लेकर तो कभी कुत्ते की तारीफ को लेकर और बात वहीं की वहीं रह जाती है। लड़की का पिता जो लड़की की बढ़ती उम्र से परेशान है वो भी चाहता है उसकी शादी इसी पड़ोस के लड़के से हो जाए लेकिन लड़की का गुस्सा बार-बार सब बिगाड़ देता है और अंत में यह प्रस्ताव मंजूर हो जाता है और दोनों विवाह के लिए राजी हो जाते हैं। कुल मिलाकर पूर्णतः मनोरंजन पर आधारित यह नाट्य प्रस्तुति एक रोमांटिक कॉमेडी है।
नाट्य कलाकारों का मानना है कि डिजिटल के बढ़ते प्रभाव से रंगमंच पिछड़ता जा रहा है। पहले से ही आर्थिक कमजोरी झेल रहा रंगमंच अब और संकट में आ गया है। ऐसे समय में निर्देशन की जिम्मेदारी निभाना भी एक चुनौती है। अब पहले की तरह सिर्फ संवाद बुलवाना या मंच उपयोग सही से करना ही काफी नहीं है , दर्शकों की पसंद और उनके समय का ध्यान रखते हुए नाटक की कहानी को उनके अनुरूप बनाना ही समझदारी की बात है परन्तु रंगमंच का मूल रूप भी नहीं बिगड़ना चाहिए। इन्हीं सब बातों का ध्यान रखने की कोशिश करते हुए लघु नाटकों की इस तरह की सीरीज शुरू की जा रही है,जिसमें कलाकारों की संख्या भी कम हो और कम से कम सेट के साथ बात को रखने का प्रयास भी रहे। इस भावपूर्ण नाटक प्रस्तुति के दौरान शहर के अनेक रंगमंच प्रेमी,रंगकर्मी, युवा छात्र, अन्य प्रबुद्ध लोगों सहित पुतुल कलाकार रामलाल, हिमांशु आहूजा, जय राज, देवेन्द्र कांडपाल, विनोद सकलानी, विजय पाहवा, दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र के डॉ. लालता प्रसाद, सुंदर सिंह बिष्ट,राकेश कुमार,आदि उपस्थित रहे।